सोमवार, 31 मई 2010

अभी बची च आस

बहुत सोचि मीला, अर इन जणना की कोशिश करि की हम उत्तराखंडी भै बैणा किलै समाज मा सामूहिक रुप मा छाप नी छोडि सकणा छंवा जब्कि सब एकला चलो की राह पर चलणा छन। 
सकारत्मक सोच त सभी रखदिन पर नकरात्मक छवि हमरी ज्यादा प्रमुख च समाज मा। सबसे बडू कारण हम खुद ही छंवा। यीं कविता मा कुछ भाव उभरिक ऎन जूं ते मीला तीन भाग मा ल्याखि -1. उत्तराखंडी किलै छन अलग[नकारात्मक]   2. हम क्या छंवा करणा आज    3. जू प्रशन उठिन वा मा हम क्या करि सकदा  और अंत मा एक आस।
[ कै भी रुप मा यू वक्तिगत या समूह कुण  नी छन या कै पर व्यंग्य नी चा बस एक सकारात्मक सोच ते बढावा दीण कु एक प्रयास च अर सबी भै बैणा अगर एक ह्वे कन सुचला त हम अपणा उत्तराखंड का वास्ता व्यापक रुप मा सह्योग दे सकदा]

~~~~अभी बची च आस ~~~~

1. उत्तराखंडी किलै छन अलग [नकारात्मक]   

पुंगडी - डांडी, गोर - बछरा, नदी - छोया सब बिसरी गैना
पापी पेट अर उज्जवल भविष्य कि खातिर सब छोडी गैना

देव भूमि च  छुट्टु सी हमर उत्तराखंड 
फिर भी करणा छंवा हम यांका खंड खंड 

क्वी च गढवली अर क्वी च कुमाऊँनी
जग मा बुलद ज्या मा हमते शर्म च औंदी

नामे की रैंदि बस सब्य़ु ते दरकार 
नी ल्याओ त सब्यू ते चढदू बुखार 

सुचणु रेंदु, कै की मौ कन मा फुकुलू 
मवसी अपणी कन मा यां से बणोलू

जख मा ह्वे जैले मेरी खाणी पीणी
वैतेई ही मीना बस अपणू जाणी

 2. हम क्या छंवा करणा आज    

अपणी बोलि/भासा मी बोल नी सकदू
फिर भी एक हैका टांग मी खिचणू रेंदू।

राज्यो मा बणेयेनि हमूला अब उत्तराखंड 
हर राज्यो मा भी छन कतना उत्तराखंड 

विदेश मा भी बण गीन बिज्यां उत्तराखंड 
हर देश मा भी छन अब द्वी-द्वी उत्तराखंड

बुल्दिन मी अर म्यार काम च असली
दुसरा छन जु वू सब छन  नकली

संस्कृ्ति का छंवा हम ही केवल पैरेदार 
एक दुसरा ते तुडना मा नी लंगादा देर

मी छौ बडू म्यार छी बडा कनेक्शन 
लडना रंदिन जन हूणा हवालो ईलेक्शन

3. जू प्रशन उठिन वा मा हम क्या करि सकदा  

राजनीति केवल नेताओ ते करणा दयावा
वू ते सबक सिखाणा सब एक ह्वेई जावा

अपनी भासा अर बोलि जरुर तुम जाणा
संस्कृति अपणी की असलियत तुम पछाणा

एक अर एक द्वी ना,बल्कि ग्यारह तुम ह्वे जाओ
उत्तराखंड ते अपणो खंड  - खंड नी हूणी दयाओ

देव भूमि कूं विकासा का विचार  तुम राखा
कन पलायन रुकला यांकि  सोच तुम राखा

अपणा उत्तराखंड क भविष्य की बात जब ह्वेली
शिक्षा बिजली पाणी अर सडक गौं-गौं मा जैली

रैला दगडी दगड्यो अर  करल्या कुछ काम
बुलणु नी प्वाडलो कैतेई फिर अफि होंदु नाम

खाणी पीणी ना केवल,मिलन मा करया तुम खास बात
हर कार्य मा अपणी ना, उत्तराखंड की करयां तुम बात

...अंत मा एक आस

उत्तराखंड मा च  देवी - दिबतो कु वास 
खंड नी हूणी दूयला अभी बची च आस

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल , अबु धाबी



(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

रविवार, 30 मई 2010

" कच्ची ( दारु ) "

( सूर्य अस्त /पहाड़ मस्त॥ स्वर्गीय कबी गुरुदेब कन्हया लाल डंडरियाल जी की कबिता " चा " से प्रेरित होकर )

" कच्ची ( दारु ) "

कच्ची भवानी इस्ट च मेरी
दिलम बस्दा, बस क़चि वा
एक तुराक जख्मी मिलजा
मंदिर मिखुणि ब्ख्मै चा
सुधनी मीथै अपणा बिरण की
याद नि औंदी मी कै की ...
स्वीणम बीणम रटना रैंदा
दगड्ओ मीथै, बस कचिकी
बच्यु छो, मी कच्ची पीणाकु
मुरुणच मिन, कच्ची पेकी !
मुरुणु बैठ्लू मुगदानो की तब
बाछी नि लाणी खोजिकी
हथपर दिया दगड्ओ मेरा
बोतल बस एक कच्ची की !!
गिचम म्यारो घी नि धुल्णु
धुल्या , पैली तुराक भटी का
हबन कनी चितामा मेरी
पैलू पैलू कनस्तर कची का !
सटी लगया ना छुरक्यु मेरी
ख्ल्या रस्तोमा बोतल कच्ची की
अर उकै कदमा रवा सांग मेरी
ज़ोकी दूकान ह्वी कच्ची की !
लास मेरी मडघट माँ दगड्यो
ली जैया ना तुम भूलीकी
फुक्या मीथै कै रोंला / गदाना
जख गंघ आणीहो कच्ची की !
चिताका चोछड़ी मडवे म्यारा
बिठाली उ , क़चि दीणा
किरय्म मारू वी बैठला
बैठी जैल, दिनभर क़चि पिणा !
एक द्शादीन कटुडया आलू
कटुडम वे थै भी क़चि देल्या
दवा दशाका दिन बमणू थै भी
कची पीलोंण तस्लोला !
कची बणी ह्व़ा सुंदर सी
अर गंध आणि हो जैमा
एक गिलास म्यारा सिरोंदो
धैरिदिया तुम मीकु खाँदै माँ

- पराशर गौर
मई २९ दिन्म ३ ४५ पर २०१०


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 27 मई 2010

मी उत्तराखंडी छौ - एक सर्वे


मी उत्तराखंडी छौ - एक सर्वे जै मा 90 लुखो न भाग लैयी। आप क वास्ता

1. खुशी ह्वाई कि 90 लुखो ने भाग लेई।
2.
गढवाल कुमांऊ हमर  उत्तराखंड की शान छन।

3. यू भि खुसि की बात  कि बिंडि लोग अपणी भासा/बोलि क प्रयोग कर दिन।हिन्दी ज्यादा लोग बुलदिन (या मा हम लोग थोडा कोशिश करि सकदवा।
4.
अच्छू लग कि अपणो व्यजनो क दगड लोग स्नेह रखदिन।
5.
संस्कृति से भी काफी लोग परिचित छन।


6. या भी खुसि क बात च कि लोग जणद छिन अर फिर भी सिखण चदिंना।
7.
उत्तराखंड / भारत और अन्य देशो मे रेण वोल भी या मा शामिल ह्वेन।
8.
काफी ज्यादा लोग उत्तराखंड समूह से जुड्या छन अर जुडन भी चाहण छन।


9. संस्कृति क दगड जुड्या खेला मेलो क तरफ भी ध्यान च।
10.
खुशी ह्वाई कि बहुत से मित्र कुमाऊँनी/गढवली मा लिखण चाहंदिन। जू भी दगड्यो न हामी जतै सब्य़ु ते आमत्रण भेजियाली ये ब्लाग मा लिखण क वास्ता।


शुक्रिया जु दगड्यो न भाग लेई अर वूं सबी मित्रो कु भी अब ये ब्लाग मा भी अपर योगदान दीणा कुण भी तैयार छन।
-प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी, यूएई
(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

बुधवार, 19 मई 2010

आज फिर वूं तै


एक कविता हिन्दी मा लेखि छैई स्वाचि गढवली मा भी लेखि दूयं
http://merachintan.blogspot.com/2010/05/blog-post_14.html 
[आज फिर उनको हमारा ख्याल आया
सपने में आकर चुपके से मुझे जगाया]

~ ~ ~ आज फिर वूं  तै~ ~ ~

आज फिर वूं तै मेरो ख्याल आई
सुपिना मा आई कन मितै जगाई

बुलण बैठी भूली जाओ ब्याला कि कहानी
अब  फिर शुरु करला हम एक नै कहानी

तुमि ते मी अपरु सहारा बणान चांदू
तुमि तै अपरु प्यार मी  बणान चांदू

तुम्ही छंया म्यार श्रृंगार - दर्पण 
करणू छौ तुम्ही ते मी सब अर्पण

आज फिर मितै अपरु गल लगे ल्याओ
अपरु नाराज़ दिल ते अब  मनै ल्याओ

अब ज्यादा नी करि सकद मी इंतज़ार
खडू छौ मी लेकन फूलूँ कू  हार 

आज फिर वूं तै मेरो ख्याल आई
सुपिना मा आईकन मितै जगाई


- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी, यूएई


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

शुक्रवार, 14 मई 2010

हे जी सुणा......छी भै




कुछ याद आई गौं का बारा मा त यू भी याद आई कि उत्तराखंड मा बिठला द्वी शब्दू का प्रयोग करदिन.. 
"हे जी सुणा" अर "छी भै" त सोची की द्वी शब्द मी भी लेखि दूंय नोंक  झोंक



हे जी सुणा
उठो दि घाम ऎ गै
चाय लयो,चिनी की गुड़
          लोलि जरा झूठी केरी ले
          फिर नी चैणी चीनी न गुड़
छी भै........

हे जी सुणा
सरग च गगराणू
बरखा च हूणी
          चल रुझि जौला
          गीत हम भी लगोला


छी भै........

हे जी सुणा
कांया मा खैला
भुज्जी मा कि बणो साग 
          सुणदि! तू इखमा बैठ 
          तेर कचपोली बणोदु आज


छी भै........

हे जी सुणा
चलो घूमि ओला
भितरा भीतर बौले ग्यों
          चल मेरी नारंगी दाणी
          ल्योल वापिस यीं मुखडी कू पाणी


छी भै........

हे जी सुणा
कंरी मेरी भी सान
कन छौ मी लगणू
        जचणी छै लगणी छै मैडम 
        भगै कन ली जौ त्वेते
छी भै........



हे जी सुणा
ढलकणी च उमर
क्या मी बुढेग्यो
         केन ब्वाल, केकि आंख फुटिन
         मेरी लाटी तू स्वाणी छै दिखेणी


छी भै........



हे जी सुणा
रात प्वड़िगे
चलो सै जोला
          चुची जुन्ख्यालि च रात
          कुछ  लगोला  छुई़ बात


छी भै........




हे जी सुणा
क्या छां तुम सुचणा
हाथ लगलू तुमर चुसणा
          ल्यादि इनै तौ कुंगली हथि
          फिर क्या सुचण सिरफ चुसणा


छी भै........


हे जी सुणा
खुद लगी च माँ की
मैत जाण क ज्यू च बुनु
        जाणी छै त ज्याले पर
        पर मितै तेरी खुद लगली त 
छी भै........



(प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल , अबु धाबी यूएई)



(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)