रविवार, 26 जनवरी 2014

गंगा का छाला - खुदेंणी न रैई'



खुदेंणी न रैई' [गीत के बोल अंत में है ] - ये वीडियो एल्बम है उभरते गायक -   विनोद सिरोला जी के गाये गीतों की जिसमे उनका साथ दिया है अनुराधा निराला जी ने. इसमें गाये व् दर्शाए गीत सभी एक से बढ़कर एक है और मन में, कानो में तथा हृदय में एक जगह बनाते है. जैसे एक गीत है

'पूस' का मैना 'गाथ' ठंडेली, पालन हात्थि अलेली,
'मौ' की 'मकरैण' क्वी नी नह्येंदरू नौली-मंगरी खौलेली
फागूण मैना 'दानि' गल्वाड़यूं... रंग को लगालो

जाण वालों तुमारी न कवी चिट्ठी-पतरी न रन्त-रैबार 
यनु क्या गैनी के बौड़ी नि ऐनी यनु क्या पै के छुटिगे घार 
जाण वालों तुमारी न कवी........ 

इसमें एक टाइटल गीत है 'गंगा का छाला अर यूं चुयो का बीच ..' वैसे तो कई बार सुना व् देखा है लेकिन आज आपके साथ साँझा कर रहा हूँ कुछ विशेष कारणों से. वैसे इस गीत में एक कहानी है विदेश में रह रहे उस युवा की जो छुट्टी पर अपने गाँव जाता है. हर्शिल उसका गाँव है और दिल्ली से हर्शिल तक सफ़र वह  गाड़ी से तय करता है और अपने गढ़ देश को याद करता है उसकी सुन्दरता का बखान करता है और अंत में उसे गाँव पहुँच कर एक सत्य का सामना करना पड़ता है - पलायन. उसे दुःख होता है, सोचता है इस समस्या के बारे में और अंत में वह अपने गाँव में रुक जाता है.

मेरी पसंद के विशेष कारण है.

- पहला कारण विनोद सिरोला जी की आवाज, संगीत, उत्तराखंड के मनभावन दृश्य, तीर्थ स्थानों का जिक्र व्  दर्शन तथा इसके बोल जो मन को छूते है.

- दूसरा कारण इस गीत में जहाँ इसमें उत्तराखंड की सुन्दरता का व्याखान है वही पलायन की पीड़ा को भी समझा जा सकता है. पलायन -  वास्तव में अच्छी नौकरी व् अच्छी शिक्षा की खातिर अब भी युवा उत्तराखंड से बाहर जा रहे हैं. अगर यही हमें उत्तराखंड में मिल जाए तो इसमें कमी आ सकती है.

- तीसरा और मुख्य कारण है इसमें अभिनय. इसमें अभिनय किया है हमारे ही भाई  दीप नेगी जी ने, जो यू ए ई में रहते है लेकिन उनके तन मन में उत्तराखंड बसता है. उनका झुकाव पहले से ही कला, अभिनय और लेखन की ओर है.  उन्होंने समय समय पर इसको प्रमाणित भी किया है. हमारे साथ उत्तराखंड एशोसियेशन से जुड़े है और एशोसियेशन के सांस्कृतिक मंच में भी अहम् भूमिका निभाते है. अपनी पुस्तक 'सूर्य अस्त पहाड मस्त'  के द्वारा उन्होंने अपनी भाषा, ज्ञान और भावो का उदृत किया है. इस वीडियो में भी उनका अभिनय काबिले तारीफ़ है और उनकी इस प्रतिभा को और करीब से देखने सुनने को मिला. भुल्ला दीप और इस वीडियो में शामिल उनकी टीम के सभी सदस्यों के लिए  हमारी शुभकामनाएं !!


आप गायक विनोद सिरोला जी और अन्य कलाकारों के प्रोत्साहन देने हेतू ही नहीं बल्कि इस वीडियो के द्वारा जो सन्देश दिया गया है उसे समझने के लिए भी इस वीडियो को जरुर खरीदे, देखे और सुने

पेश है गीत गंगा का छाला के बोल व् वीडियो

गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२
कैन बसे या धरती-२
या धरती या गढवाल की,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२
कैन बसे या धरती-२
या धरती गढवाल की,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२

पंचबद्री,पंचकेदार,पंचप्रयाग यखी छ्न
पंचप्रयाग यखी छ्न
पंचबद्री,पंचकेदार,पंचप्रयाग यखी छ्न
पंचप्रयाग यखी छ्न
नंदा कु मैत यख अर शिवजी कु तपोवन,
देव्त्तों का थान छन-२
अर हिमंवंती देवियों कि डोली,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच
कैन बसे या धरती-२
या धरती  गढवाल की,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२
हो हो हो हो हो हो,
हो हो हो हो हो हो

कैन रोपि नि डाली-वोटी ,कैन पाथीनि डाडीं-कांठी
कैन पाथीनि डाडीं-कांठी,
कैन रोपि नि डाली-वोटी ,कैन पाथीनि डाडीं-कांठी
कैन पाथीनि डाडीं-कांठी,
श्वेत रंग मा कैन रंगी नि सबी सी ऊंची यु चूई चांठी,
कैका बोल्यान छ्न बगणी-२
ये गाढ गदना रोली बौली
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२
कैन बसे या धरती-२
या धरती गढवाल की,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२

सीधा-सादा मनखी,सीधु -सादु घर संसार यख
सादु घर संसार यख
सीधा-सादा मनखी,सीधु -सादु घर संसार यख
सादु घर संसार यख
कोणी कंडाली खैक भी,मुखडियों मा मौल्यार यख
घणा बौण छ्न छांटा गौं-२
अर मन भौण्या यखका कि बोली
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच
कैन बसे या धरती-२
या धरती या गढवाल की,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-२

वैन बणाई लाख जतन कै,हमुन मोल नि जाणी जि,
हमुन मोल नि जाणी जि,
वैन बणाई लाख जतन कै,हमुन मोल नि जाणी जि,
हमुन मोल नि जाणी जि,
स्वर्ग सी स्वाणी धरती छुलैकि परदेश भलु माणी नि,
आवा कुछ दिन रैक ती दिखा-२
सुख सुविधों कि बेडी निखोली,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच
कैन बसे या धरती-२
या धरती गढवाल की,
गंगा का छाला अर ह्यूं चुलो का बीच-४




- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 
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(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

शनिवार, 18 मई 2013

म्यार आखर - मेर कबिता



बिना आखरो कु रीतू छौं
लिखणू रेंदू
सब्द बणना रंदीन
उमाल आणू रेंद
पन्ना गिल्लू करणू रेंदू

म्यार लिख्याँ आखर
सब्द बनी की
के कुण कबिता छन
त के कुण लेख छन
के कुण ठट्टा छन
के कुण आखर छन
आप ते जन लगल
बींग लेन ...... म्यार लिख्याँ आखर

म्यार लिख्याँ आखर
सब्द बनी की
अंखर - पंखर ते कुम्लांद छन
जिकुड़ी ते लीपी जन्दीन
मेर मनसा बींग सक्लया
बींग लेन ... म्यार लिख्याँ आखर

म्यार लिख्याँ आखर
सब्द बनी की
डांडी कांठीयूँ ते ज्युन्द केर जन्दीन
गाड गदनयो कु छुन्छयाट सुने जन्दीन
हाड़ भी छक्के की धे लगादीन
सूण सकल्या त सुणी लेन
बींग लेन ...... म्यार लिख्याँ आखर

म्यार आखरो मा
बोण क डाला कभी रुंद छन
त कभी गद बद मा रंदीन
म्यार आखरो मा
ब्वै की खुच्यली च
त कैबर बाबा की फटकार च
सूण सकल्या त सुणी लेन
बींग लेन ...... म्यार लिख्याँ आखर

म्यार आखरों मा
बाटा रैबार लिजन्दीन
संस्कार अर संस्कृति
बोडी क आंदीन
म्यार आखरों मा
डाला बूटा मोल्यार लंदिन
फुयोंली अर बुरांश खिगताट करदिन
कुलै अर कुएड़ी अपणी खैरी लगादिन

म्यार आखरों मा
रं रैबार च
जिंदगी की खुल्दी गेड़ च
म्यार आखर
सेवा सौंली भिजदीन
सूण सकल्या त सुणी लेन
बींग लेन ...... म्यार लिख्याँ आखर

-प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
[काव्य एवं सांस्कृतिक सम्मेलन, दुबई, यू ए ई मे प्रस्तुत कविता ]

(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

ब्योला गधम ....

( ये कबिता मेरी और स्वर्गीय डंडरियाल जी के बीच की थी संन 1974 के बात है हम किसी शादी में थे मैंने उनसे एक सवाल किया था )
घोड़ीम चडदै ब्योला डंडरियाल जी मिन ब्वाला हो जी गुरूजी ज़रा इनै आवदी दिलम च एक शंका अईकी जरा वी मिटावादी !
उन बोली "हाँ " बवालों बवालों क्या च सवाल ख्वालो ?
मयारू सवाल सूणा हो घ्वाड्म किलै चड्द सजधजी ब्योला गधम क्यों नि बैठद !
उन बोली ---- हाँ बुना त तुम ठीक छा अर हुण भी एनी चैन्द एक काम कैद्वा अगल्य साल तुम्हारा नौनो ब्यो च आप ही रीती थै बदल द्यावा एक गधा थै हनका गधम बैठे दयवा !
 -------- पाराशर गौर


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली) एक गड्वाली हास्य कविता रीत बदला ! 

रविवार, 21 अक्टूबर 2012

मैं किलै जाऊँ पहाड़


(इस रचना मे गाँव के लोगो की आस व आज के नौजवानो का जबाब )


उतराखंड का दाना - सयाणा
बस रंदीन दिन रात बरड़ड़ाणा
नौना - नौनियूं तुम बौड़ी आवा
उत्तराखण्डे की संस्कृति ते पछाणा
कूड़ी - बाड़ी ते अपणी देखि ल्यावा
बची च लस अबी, हमते देखी जावा
बाद मा याद केरी की फिर पछ्तेला
जलम भूमि कु करज कन मा चुके ला
आ जावा अपणा पहाड़...

अरे बाडा, अरे दद्दा, किले छाँ बुलाणा
किले छाँ अपणी तुम जिकुड़ी जलाणा
आज तलक हम ते क्या दे ये पहाड़ा न
न शिक्षा न नौकरी, बौड़ी की क्या कन
मैं किलै जाऊँ पहाड़ .....

हिन्दी आप लोग बिंगी नी सकदा,
अँग्रेजी हमर दगड़ बोली न सकदा
भैर जै की हमुन हिन्दी अँग्रेजी सीखी
गढ़वली - कुमौनी ते कीसा उंद धैरी
मैं किलै जाऊँ पहाड़ .....

गढ़वली - कुमौनी मी अब नी बुल्दू
समझ मी जांद पर बोली की सक्दू
छन कथगा जु बुलदिन अपणी भासा
पर पछाण हमरी हिन्दी अंगरेजी भासा
मैं किलै जाऊँ पहाड़ .....

उकाल गौं की अब मी नी चेढ़ सकदू
बाड़ी झुंगरु कंडली अब मी ने खे सकदू
झुकी की खुटा मी केकु नी छ्वै सकदू
बिना दाँतो की बात अब नी बींगी सकदू
मैं किलै जाऊँ पहाड़ .....

मी कखी छौं गढ़वली, कखी छौं कुमौनी
किलेकि उख ह्वे जांदी थ्वाड़ा खाणी पीणी
इनै - उनै केबर मी उत्तराखंडी बण जान्दू
उत्तराखण्डे की बात पर पिछने सरकी जान्दू
मैं किलै जाऊँ पहाड़ .....

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 




(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

म्यार उत्तराखंड




जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

देव भूमि ते हमन अपणों जाणी
सेवा करला, या कसम हमन खाई
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

तब नौ की नी केरी केन परवाह
उत्तराखंड बणी जावा बस या छे चाह
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

केन जवानी देई, केन भाई, केन दगड्या ख्वेई
केकु सुहाग उजड़ी अर केकी खुखली सूनी ह्वाई
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

उत्तराखंड बणे की मी बिसरी ग्यों
बस नेतागिरी मा मी उल्झुयूं रे ग्यों
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

देहरादून मा ठाठ छन, गेरीसेण भूली ग्यों
अपणी जेब सब्यूं भोरी, पहाड़ा की केन नी सोची
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

गौं बटी मी भागी, अपणी भासा बी छोड़ी
उत्तराखंडी नामा कु, कूड़ी बाड़ी सबी छोड़ी
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

आज सबी उखक सरबे सरबा छन बणया
जु च स्वारु भारू, वे क त भाग छन चमकया
जागी जागी की उत्तराखंड बणेई
मौका आई त मी सियूं रे ग्यों

चला चला रे उत्तराखंडियों अब सियां नी रावा
उठी जावा, सुपीन मा न असली उत्तराखंड बणावा
गढ़वली कुमौनी न बणा, उत्तराखंडी तुम बणी जावा
स्वाचो न, बस अब कारा, उत्तराखंड ते आज बचावा

- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)