मंगलवार, 10 नवंबर 2020

बुलदु बल ....



बुलदु 
गॉगल्स चढ़े की बौलां बीटे की
अपणी साने की रंगत मा र्ंग्यू
अदक्ची गढ़वेली बचे की
हिंदी अँग्रेजी रीमिक्स करी की
ने पीढ़ी को प्रतिनिधित्व करदू
चक्ड़ैत छ्वारादेसीस्टाइल मा
ने जमानों कू स्वींसांट मा 
बिंगदू भी च अर बुलदु भी च ....
 
बुलदु बल
गोर चराण मा अब सान कहाँ है
खेती बाड़ी मा इख क्या धरयू है
बाड़ी फाणू झुंगर गिचुंद नही जाता है
फास्ट फूड कॉन्टिनेन्टल छ्के की खाता हूँ
टुटी सड़क सुख्या गाड़ा गदोना मा
यीं खरडी पुंगड़ी डांडा मे क्या रखा है
गौं बजारे की अदकची अब चढ़ती नहीं
स्कॉच देसी बियर मा खूब रंगत आती है
 
बुलदु बल
अब गोर बखर नहीं चराना पड़ता है
दूध घी समणी झट से मिल जाता है
पल्यों झुली दाल भात सपोड़ेंन्द नी च
पंजाबी कड़ी दाल मखनी शौक से खांदू
फजल मा रूटी भुज्जी अब नी खयेन्द
ब्रेड टोस्ट बर्गर से ब्रेकफ़ास्ट मी करदू
घौर की साग सगौड़ी मे अब क्या रखा है
कीसे मे नोट जू चेणु वो झट आ जाता है
 
बुल्दू बल
हाँ कभी मुझे घेर गाँव की खुद लग जाती है
गढ़वाली गाणो सुन कर खैरी अपनी भगाता हूँ
ब्यो बरात मा गाणो ढ्स्का लगाण ज्यू बोलता
पर क्या बोल गौं जाणे का दिल नहीं बोलता
कबी सुच्दू भी छौं किले पहाड़ से भेर आया
फिर द्वी पैसा देखि की मन ललचा जाता है
कबी मन करता है काखड़ी अर आम चुराने का
चूना की रूटी अरसा अर स्वाल पकोड़े खाने का  
 
बुलदु बल
देस बिदेस मा उत्तरखंडी पलायन पलायन बोलता
खुद बणी गे परिवार बणे कीहमको उंद धकेलता 
आफू कुण सबै करदीन औरों कुण केरा त जाणा
राज्य/लोगो की क्वी नी सुच्दू सब अपणी चांदा
हमनू अपरु स्वाच त सब धे छ्न हमते लगाणा
बौड़ी आवा बल पलायन रोकागौं ते अपर बचावा
शिक्षा नौकरी क कुछ कारात हम बी बौड़ी औला
तेरी सौं गढ़वाले अर राज्य की सेवा कुछ करला 
 
 
प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल१० नवंबर २०२०



(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 5 नवंबर 2020

अरसा कुण नी तरसा




हिंदी कू अरसा मतलब हूंद टेम च
गढ़वली अरसा मतलब हूंद क्ल्यो च 
देवभूमि क यू एक प्रसिद मिस्ठान च
ब्यो बरतियू मा यू हमरू सम्मान च 
उन बुल्दिन अरसा कर्नाटक बटी अयूँ च
छ्याई अरसालु हमर इख अरसा बण्यू च 
उत्तराखंड मा बरस्यू बटी खूब छयूँ च 
देवभूमि मा अरसा शंकरचार्य क ल्यूँ च 

याद कराणू छौ तुम भी अरसा बणे ल्यावा
चोलों ते राती कुण भीगे की धेरी द्यावा 
उरख्याली मा कूटो या तुम पीसी ल्यावा 
गुड़ चूरी क या ताक बणे सौंफ मिले ल्यावा
ज़रा पाणी, घ्यू मिले की लोई बणे द्यावा
तिल डाली की  अरसों ते न्ये रूप द्यावा 
सरोंसू तेल मा तली की अरसा बणे ल्यावा
गरम खावा चाहे मेना भर कू धेरी द्यावा 

देवभूमि का खाणों मा मिलदी च खूब रस्याण 
अरसों क क्या बुलण अर तुमते अब क्या सुणान
रिंगाsले क बणी हथकंडी च सुबकामो क पछाण 
मालू अर तिमला क पतो मा अरसों कू सम्मूण
मीठे दुनिया भरे की पर अरसा कू स्वाद बेजोड़
भे बंदो कू परेम अर सुसरास मा नी यांक तोड़ 
स्वालों पकोड़ो दगड़ी अरसा बणी हमरी पेछाण
नी बिसरी जेन हमरी संस्कृति अर हमरी पछाण

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, ०५/११/२०२०






(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

मंगलवार, 3 नवंबर 2020

ठुंगार






आज सूबेर सूबेर
हेर मरच
कमर मटकेकन
म्यार तरफ दिखण बैठ
लगणी त छे
बिगरेली बांद जन
अर मुल मुल हेंसणी भी छे
हंसदा हंसदा
जन बुल्णी होली
पहाड़ ते बिसर ग्यों तुम
मीतेई नी बिसर ह्वेला
हर खाणा कू स्वाद
मेर ठुंगार
लिया बिन
कन मा बिसर सकद्वा तुम

सिलबट्टा मा खड़ा लूण
धनिया अर लेसुण दगड़
पिसी की त मेर माया
उतराखंडी क जीभ हे बतेली
कखड़ी आम अमरूद
चोरsक खई त होली
कखी न कखी
मेरो स्वाद
मेर याद
तुमों मा सम्मूण जन होली

अरे सूणा
जख भी ह्वेला तुम
रुटी भुझी खावा
दाल भात खावा
फाणू भात खावा
झुल्ली भात खावा
चेस्वणी भात खावा
उत्तराखंडी खाणा
बिसरेन न
अर मेर ठुंगार दगड़
स्वाद तुम ल्यावा

बस हेर मरच दगड़
जरा सी संवाद
झट तोड़ी क लयों,
दाल भात अर भुजी
क दगड़ लेकन ठुंगार
गीच मा मेरे आईगे स्वाद
उल्यारु ज्यू
सगोड़ा अर गौं का
सुपीन दिखण बैठ ग्याई

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल ३ नवंबर २०२०


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गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

सुचदु रे ग्यों ...


सुचदु रे ग्यों ...

गौ की खुद लगी
बौण धे लगाण बेंठी
सुपिन फिर कुछ इन हवाई

सुचण बैठी कथका बरसो बाद
जल्मभूमी कू अब दर्शन ह्वाला
गौ मा कू हवालों, कू मिललू
कू पछाणsल, कू भेंटुलू
कुजsणी कू मुख मोड़ी जाsलू
कैकी आंखियू मा पाणी आलू

सुपिना मा
झुल्ला झुल्ली थैला मा धारी
रट पट पैटी गयो मन छो भारी
लग ग्यों बाटू
बाज़ार पोंछी त खुज्दू रेग्यो
अपणु कवी नी दिख्ये
नौंनबाला दानु सयाणु
जू दिखेंsनी
सब्यू की आंख्यू मा
सवाल छाई दिखेणू
कु ह्वालो, कु छे रे देशी
रस्ता भूली कि अपणु छे क्वी

बिना कुछ बुल्याँ रस्ता लगी
जणयूं पछन्यु बाटा
मुल मुल हंसण बैंठी
भिटेण लगीन डाला बूटा
बिसरी ग्यु थकान
बैठी ग्यो उंका दगड छ्वीं लगाण
आंदा जांदा मनखी क्वी नी रुकी
बस खित खित हैंसी चिढ़ाणा रेन

नै मकान गौ का
पुरणी कूड़ियों पर हंसणा छयाई
जख क्वी छयाई अपणु
उख अब प्रेम रीतू छयाई
भिभराट अब नी राई
छुया बिसकी गीन
पुंगड़ी बांजी पोड़ गीन
मनखी बिसरी गीन
झणी कख हरची गीन
खिलाण अर गुठ्यार
अब ह्वे गीन खन्द्वार
न क्वी सुणदरू
क्वी नी आंद न क्वी लांद रैबार

खोंल्ये ग्यों,
कैकी सिकेत के मा केरू
क्वी नी दिखे
जेकुण बोल तू छे मेरु

एक द्वी दाना सयाणा क दगड भेंट ह्वाई
जाण पछाण अर फिर सेवा सौंधी ह्वाई
मिलण की खुसी, आंख्यू में देखी
नींद मा भी
उंकी जग्वाल देखि की
म्यार आंख्यू मा भी छयाई पाणी
उंकी पीड़ा देखी मन रुझे गे

म्यार पहाड़
टक लगे की बुलाणा छन
पर ‘प्रतिबिम्ब’ जौ कनके की
यू ही सुचदु रे ग्यों
यूं ही सुचदु रे ग्यों ...

प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल, दुबई

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शनिवार, 8 अगस्त 2015

कसूर


यूं डांडी कान्ठियू क, ब्वाला क्या च कसूर 
यूं रीता कूड़ी बाड़ीयू क, ब्वाला क्या च कसूर 
किले हुयां छन मनखी, अपरी जलमभूमि से दूर 
कूड़ी पुन्गडी अपणा बांजा करीक, बसी गीन दूर

उन्द जेकन उबक बाटू अब क्वी नी दिखदू 
कथका धे लगाणू छौं, पर अब क्वी नी सुणदू
भासा ज़रा ज़रा क्वी बचांद, बाकी क्वी नी बिंग्दू
सबी कुमौनी गढ़वली, क्वी उत्तराखंडी नी दिखेंदू

दसा पर मेरी, तुमन कलम अपरी खूब तुडीन
गीत तुमन भी म्यार इने विने भी खूब लगेन 
देस विदेस मा मेला खेला तुमन खूब करीन
म्यार नाम पर जगह जगह नोट खूब लुटीन

दीणा कू क्या जी नी दे, ये पहाड़ा न तुमते 
बचपन बटी जवनी तक सैंती पाली अर पोसी
कुछ करण कू बगत आई, तुमन बस बोग मारी 
मीते यखुली छोडी, परदेस मा करी जमे सारी

अबी कुछ नी बिगड़ी, सोची समझी बौडी आवा
अपरी जन्मभूमि ते देर सुबेर ज़रा देखी जावा
बाळ बच्चो ते लावा, वूं ते मेरी पछाण बतावा
जलमभूमि ब्वै समान हूंद, यू तुम जाणी ल्यावा  


-    प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल 

(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)