शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

ब्वाला जी...

ददा-ददी, नना-ननी सच बुल्दू छ्याई
हमर पहाड मा देवी - दिवता रेंद छयाई
आज भी छीं देवी - दिबता पर रुठया छन
कखि हमर पूर्वजो ते ठेस नी लगी होलि

ब्वाला जी यूँ तो मनाणा कु क्या कन

डांडी कांठियूँ मा घुघुती घुरुदी छैई
अब कुजाण कख गुम ह्वे होलि
रौतेली शान छैई उत्तराखंड की
अब कुजाण जख हरचि होलि

ब्वाला जी अब कख  खुजोला

हेरी भेरी छै पुंगडी, डाल बूटि छ्याई हंसद
बिसर गंवा हम कन दिखेदं छ्याई यू सब
नदियू देखि प्राण हेरु  हून्दू छ्याई वेबरि
आज कखि बांध बणि गै कखि धरती मा समे गै

ब्वाला जी कन मा रुकालो यू बदलाव

क्या बुलणा अब कैकि नज़र  लगी होलि
आज दिखाणा छंवा हम की प्रलय मची
उत्तराखंड मा आज फिर पाणी पाणी हुयँ
पहाड टुटणा छन अर गंगा विकराल बणी

ब्वाला जी कन मा होलु यांकू समाधान

-       प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल

(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 23 सितंबर 2010

ईन बरखा पैली कभी नी देखी

ईन मुसलाधार बरखा ना लगा धी
जख दिखा पाणी, पाणी हुयू छ..
ये पाणी सी अब, हमतै बचा धी

३२ साल कू रिकार्ड भी टूटी....
ईन बरखा पैली कभी नी देखी
पाणी मा पहाड डुबणा छन..
बस करा अब बहुत हवे ग्यायी

घर कूडी भी पाणी लीगी ग्यायी
गोर-बखरा सभी, बैगी ग्यायी....!
बेघर हुंय़ा छन मेरा पहाड क मनखी
ईन्द्रदेव जी तीन क्या करियाली ?

करोडो कू नुकसान हवे ग्यायी
खीयी-कमायी सब पाणी मा ग्यायी
पाणी बगैर तडपणा छा कभी...
आज पाणी मा सरै पहाड डुबै दयायी

गंगा जी कू पाणी बढी ग्यायी
कोसी नदी उफ़ान मा छायी
सागर नी देखी छ कभी !
टीहरी की झील मा यू भी देखीयाली

सैकडों लोगों की जान चली ग्यायी
स्कूल पढदी बच्चो तैभी नी छ्वाडी
श्रर्धान्जली ऊ दिवंगत आत्माओ तै
जून ये पाणी मा प्राण ख्वे दयायी


विनोद जेठुडी 21 सितम्बर 2010, 7:18 AM
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.(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

फ़िर याद ऐगी होली

रंग रंगीली फ़िर याद ऐगी व होली, पांणी मुखडी कु सुखैगी होली।
बार-त्यौहार क्वी भग्यान मनालु, कैकी आंखी खुद मा दुख्णी होली।
मै छौं पापड बेळणु यख, अर वा आंसुम भिजीं रोठी बेळणी होली।
बरखा बत्वाणी यख होण लगीगे, व कखी चुन्नी उडौणी होली।
कुरेडी लगी यख याद दिलौणी छ, ओडा-उड्यार वा बैठीं होली।
जुं डाडियों हम्न बल्द चरैन, वा वख घास काटणी होली।
रंग रंगीली फ़िर याद ऐगी व होली, पांणी मुखडी कु सुखैगी होली।
- चन्द्र मोहन

बुधवार, 1 सितंबर 2010

कुछ इनै भी



कुछ इनै भी……

लीसू सी..
कथुक ध्वालो ये ते फुंडै
मारो कूटो भी
चिपक्यू रेंद यू
हमर दगडी
लीसू सी
  
टिपड़ा 
जन्म ह्वे ब्वै बुबा
टिपडा बनै
बामण भी द्वी पैसा कमै
सुख मा दुख मा
जब कुछ नी सूझी
फिर टिपडा पूजी
ब्यो कुण भी टिपडा मिले
अब ह्वे गीन नोन बाल
हम भी लग्या छंवा
टिपड़ा पूजण मा

मेरे जिकुड़ी
तेर भी अर  मेर भी
जिकुड़ी धक धक करदी
पर अलग अलग बाणी बुलदि
क्वी मयलू
क्वी गुसेलु
क्वी कर दू प्यार
क्वी कर दू वार
हे रे जिकुड़ी

हैंस्या नी केर
नोनि जवान ह्वेगे
लाटी अब
सब्यू की समणी
खित खित नी हैंस्या केर्
निथर लोग ब्वालल कि
ठीक नी
नोनि कु सवर
तु अब
खित खित नी हैंस्या केर  

आंखि
मुखडि मा लगी छन
द्वी ढिबरा सी आंखि
बस अफूकि दिखदू
जू दिखण चान्द
बुल्दू कि
त्यार दुख च म्यार दुख
हैंका कु दुख देखि
फुटि जंदिन यू आंखि
है तेरि आंखि
प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी, यू ए ई


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

हम छोड चले है महफिल को याद आये कभी तो मत रोना
(गढवाली मे अनुवाद करने का एक प्रयास)

हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै,
याद एली अगर त रवै न कभी
यी जिकुडी ते बुथै लेई तू,
घबरालु अगर त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

एक सुपिन सी देखी छ्याइ हमनू
जब आंख ख्वाली त टूटि ग्याई
यु प्यार अगर सुपिन बनि की
तडपाल तुझे त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

तु म्यार ख्यालो मे
बरबाद नी कैरी अपर जीवन तै
जब क्वी दगड्या बात त्वै तै
समझालू त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

जीवन का सफर मा यखुली
मितै त जिन्दा नी छ्वाडली
मुरण की खबर ये मेरी जिकुडी
मिलली त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल



(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)