मि उत्तराखँडी छौ - यू शब्द ही अपणा आप ये ब्लाग क बारा मा बताणा कुण काफी छन। अपणी बोलि/भाषा(गढवाली/कुमाऊँनी) मा आप कुछ लिखण चाणा छवा त चलो दग्ड्या बणीक ये सफर मा साथ निभौला। अपणी संस्कृति क दगड जुडना क वास्ता हम तै अपण भाषा/बोलि से प्यार करनु चैंद। ह्वे जाओ तैयार अब हमर दगड .....अगर आप चाहणा छन त जरुर मितै बतैन अर मि आप तै शामिल करि दयूल ये ब्लाग का लेखक का रुप मा। आप क राय /प्रतिक्रिया/टिप्पणी की भी दरकार च ताकि हम अपणी भासा/बोलि क दगड प्रेम औरो ते भी सिखोला!! - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
शनिवार, 2 अक्टूबर 2010
उत्तराखन्ड क शहिदो तै श्रधान्जली
आज ही कू दिन २ अक्टूवर सन १९९४ तै प्रथक राज्य उत्तराखन्ड तै "मुजफ़्फ़रनगर कांड" मा अपण प्राण ख्वे देण वाल शहिदो तै श्रधांजली.... ऊ शहिदो की वलिदानी उत्तराखन्ड क ईतिहास मा सदा अमर रालू...... "जय उत्तराखन्ड जय भारत"
सूणा उत्तराखन्ड वासी
तूम सूणी ल्यावा
अपण देवभूमी तै
तूम अगने बढावा
याद करा वे दिन
चराणनवे साल..
दवी अक्टूवर दिन
हवेन कन हाल..
मांग उत्तराखन्ड की हम
जाण छ दिल्ली..
मुज्जफ़रनगर मू पहुंची
चली गेन गोली..
कत्यो बहिणियों की मांग सून
कत्यो मां की गोद सून
लाठी मारी बहिण्यो तै
कत्यो की बहगी खून..
ऊ मां-बहिण्यो तै
हमारू प्रणाम
ऊ शहिदो तै
हमारू शलाम
उत्तराखन्ड कू विकास कला
ईन हम काम कला
देवभूमी पर अपणी
आंच कभी नी औणी दयोला
सूणा उत्तराखन्ड वासी
तूम सूणी ल्यावा
अपण देवभूमी तै तूम
अगने बढावा
(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)
शुक्रवार, 24 सितंबर 2010
ब्वाला जी...
ददा-ददी, नना-ननी सच बुल्दू छ्याई
हमर पहाड मा देवी - दिवता रेंद छयाई
आज भी छीं देवी - दिबता पर रुठया छन
कखि हमर पूर्वजो ते ठेस नी लगी होलि
ब्वाला जी यूँ तो मनाणा कु क्या कन
डांडी कांठियूँ मा घुघुती घुरुदी छैई
अब कुजाण कख गुम ह्वे होलि
रौतेली शान छैई उत्तराखंड की
अब कुजाण जख हरचि होलि
ब्वाला जी अब कख खुजोला
हेरी भेरी छै पुंगडी, डाल बूटि छ्याई हंसद
बिसर गंवा हम कन दिखेदं छ्याई यू सब
नदियू देखि प्राण हेरु हून्दू छ्याई वेबरि
आज कखि बांध बणि गै कखि धरती मा समे गै
ब्वाला जी कन मा रुकालो यू बदलाव
क्या बुलणा अब कैकि नज़र लगी होलि
आज दिखाणा छंवा हम की प्रलय मची च
उत्तराखंड मा आज फिर पाणी पाणी हुयँ च
पहाड टुटणा छन अर गंगा विकराल बणी च
ब्वाला जी कन मा होलु यांकू समाधान
- प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)
गुरुवार, 23 सितंबर 2010
ईन बरखा पैली कभी नी देखी
ईन मुसलाधार बरखा ना लगा धी
जख दिखा पाणी, पाणी हुयू छ..
ये पाणी सी अब, हमतै बचा धी
३२ साल कू रिकार्ड भी टूटी....
ईन बरखा पैली कभी नी देखी
पाणी मा पहाड डुबणा छन..
बस करा अब बहुत हवे ग्यायी
घर कूडी भी पाणी लीगी ग्यायी
गोर-बखरा सभी, बैगी ग्यायी....!
बेघर हुंय़ा छन मेरा पहाड क मनखी
ईन्द्रदेव जी तीन क्या करियाली ?
करोडो कू नुकसान हवे ग्यायी
खीयी-कमायी सब पाणी मा ग्यायी
पाणी बगैर तडपणा छा कभी...
आज पाणी मा सरै पहाड डुबै दयायी
गंगा जी कू पाणी बढी ग्यायी
कोसी नदी उफ़ान मा छायी
सागर नी देखी छ कभी !
टीहरी की झील मा यू भी देखीयाली
सैकडों लोगों की जान चली ग्यायी
स्कूल पढदी बच्चो तैभी नी छ्वाडी
श्रर्धान्जली ऊ दिवंगत आत्माओ तै
जून ये पाणी मा प्राण ख्वे दयायी
विनोद जेठुडी 21 सितम्बर 2010, 7:18 AM
.(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)
गुरुवार, 16 सितंबर 2010
फ़िर याद ऐगी होली
रंग रंगीली फ़िर याद ऐगी व होली, पांणी मुखडी कु सुखैगी होली।
बार-त्यौहार क्वी भग्यान मनालु, कैकी आंखी खुद मा दुख्णी होली।
मै छौं पापड बेळणु यख, अर वा आंसुम भिजीं रोठी बेळणी होली।
बरखा बत्वाणी यख होण लगीगे, व कखी चुन्नी उडौणी होली।
कुरेडी लगी यख याद दिलौणी छ, ओडा-उड्यार वा बैठीं होली।
जुं डाडियों हम्न बल्द चरैन, वा वख घास काटणी होली।
रंग रंगीली फ़िर याद ऐगी व होली, पांणी मुखडी कु सुखैगी होली।
- चन्द्र मोहन
बार-त्यौहार क्वी भग्यान मनालु, कैकी आंखी खुद मा दुख्णी होली।
मै छौं पापड बेळणु यख, अर वा आंसुम भिजीं रोठी बेळणी होली।
बरखा बत्वाणी यख होण लगीगे, व कखी चुन्नी उडौणी होली।
कुरेडी लगी यख याद दिलौणी छ, ओडा-उड्यार वा बैठीं होली।
जुं डाडियों हम्न बल्द चरैन, वा वख घास काटणी होली।
रंग रंगीली फ़िर याद ऐगी व होली, पांणी मुखडी कु सुखैगी होली।
- चन्द्र मोहन
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