शुक्रवार, 18 मार्च 2011

छुरोली [होली] पर एक रैबार



छुरोली [होली] पर एक रैबार

होली का रंग मा रंगयु च हर एक उत्तराखंडी
गढ़वाल कुमाऊँ बटि अई च कलयो की कंडी

छुरोली मा रंगमत हुयूं च बणे कअपरी टोली
ढ़ोल दमौ का दगड़ी नाचि क मनाणा छन होली

होली का हुलयार अयां छन करो स्वागत हे उत्तराखंडी
लगावा प्रेम क रंगू की पिठेई अर भिटें ल्यावा वुं दगड़ी

याद कारा पित्रों तें, आश्रीवाद अपर दिबतों कु तुम ल्यावा
बेरंग स्वार्थ ते छोड़ी द्यावा, हम का रंग मा तुम रंगी जावा

आज उत्तराखंडी तुम एक होई जावा, मन को मुटाव तुछोड़ी द्यावा
हर रंग ते आज मिल द्यावा, उत्तराखंड मा एक नै सुबेर लेई आवा 

प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल 


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

सुधि सुधि ,मी , स्वीणा नि दिखावा !

बोडी,
अफ़ी अफुम छै बुनी ..
यखका सुचणा छना ..
कि, उन्दु जौला ......
अर तखुन्दा (प्रवासी ) सुचणा छन
कि उबू जौला .....!

मिन बोली , बोडी...,
तू क्या छै सुचणी ?

बोडिल ब्वाळ ...
ना यख वालों न रुकुनु ?
अर , ना ताल वालो ल आणु
गिचा बाबू .. क्या .... ???????
जू बुल्दन बुल्द जा
जू सुचणा छन , सुचुद जा ..

आणा छा, त आवा
जाणा छा , त जावा
पर सुधी सुधी , मी थै
स्वीणा त, नि दिखावा !

पराशर गौर
१८ मई २०१० रात १०२१ पर
कैनाडा

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

भांची

दि उ .....
फुंडू फुका यार ...
कैकी छा छुई लगाणा !

इत्कै गाल गाल अ ईच नौनी
त,
गंगाजिम डाल दया
वीथै भी अर तुम थै भी मुक्ति मिली जाली
क्या समझ्य !?
नि बिंगा ??
खत्यु च खत्यु !

पराशर गौर
मई १४ स्याम ५ १७ पर २०१०

बदोबस्त / एक MAZZAK

मिन बोली समधण जी ..
यखी रै जावा ?
समधण बोली ..
रैनू त रै जादू पर ,
तुम्हारा समधी क्या ब्वाल्ला ,जर समझाया !
मिन बोली ..,
वांकी तुम फ़िक्र न कारा
समधी खुणि मी बोली द्युलू
भै , मयारू बदोबस्त ह्वैगी ...
तुम अपणु कैलीया !

पराशर गौर
मी २० मई २०१० दिन्म २. बजी !

बादी

एकल मी थै पूछी...
साब आप आसा बादी छा
या निराशाबादी ....!
मिन बोली ...
कैकी आशा, अर कैकी निराशाबादी
कनु सवाल छे तू कनु ?
अरे , भुला, मित ....,
"बादिल " ( गैस ) छो मुनु