बुधवार, 4 अगस्त 2010

दयब्तौ की खोज !

बोड़ी चौकम छे बैठी ! आंदा जान्दो दगड छे बच्याणी , कि तैबेरी , मेल्या खोलै रामचन्देरी वाख्म एकी बोड़ी से छुई लगाद लगाद पूछंण बैठी
"... हे जी , तुमल भी सुणी ? "
बोड़ी बोली .. "--- क्या ?"
".. ह्या , बुने, क्वाठा भीतर का वो जेवोर , जौकु नौ .... कने लियु उकु नौ " ! बिन्गैकी की बुलद "------ जौक नौ, स्युजू तुमरा देलम बैठुच ! "
बोड़ील वे जाने देखी आर बोली .. " वो कुता सिंह ..! ."
"हांजी, हां ...! " वी--- वी .... "
वीजने घूरी की बोड़ी बोली " ----- कनु क्या ह्वे कुता सिंह थै ? "
" -----सुणम.. आई कि, उकु नाती घोर च बल औणु , अपना दादा प्रददौ कि कुड़ी थै दिखनो अर अपणा नार्सिंग देब्तो कि पुजाई कनु ? "
"---हाँ --- हाँ !" ददल ,त, नि खोजी आज तक अपणी गौंकु बाटु, अपणी पुगाड़ी - पटुली ! ताखुँदै राई ता जिन्दगी भर ! बोई बाटु हेरी २ मोरीगे ! कुड़ी धुर्पाली उजड़ी गीनी !
न उ आयु अर ना नौनी ! द्वी पड़ी तक कैल भी याख्की शुद्ध नि ले ! बोड़ील , सांस लेकी अर वेकि कुड़ी जाने हेरी बोली .... " ब्वारी .. मित बुनू छो कि, यु नर्सिंग इनी ताखुन्दा बस्या लुखो थै भी नाचे नाचे घोर बुलादु ना त कनु छायू ! पैल, ये सबी नौकरी खुज्यणु तखुन्द गिनी ! अर, अब , वो सबी ..., ये जनि अपणा अपणा दय्बतो थै खुज्यानु घोर ऐ जांदा ना..., त , हे पणमेस्वरा .. मी भी त्वेमा सबा रुपया चढाई ध्युलू !
पराशर गौर
दिनाक ४ अगस्त २०१० स्याम ६ ५३ पर

गुरुवार, 29 जुलाई 2010

गढ़वाली गीत (अपणू घौर बार देख ल्या)


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

शनिवार, 24 जुलाई 2010

मसक बाजा Copyright © (गढ़वाली)



भैजी क्या हवे गी तुम सने

तुमन सब छोड़ेले

धुन जु ह्वेन्दी छयी कानो मा

वीं सने भूल गेन

तेज़-तेज़ ज़माना मा

तुमन मसक बाजा सने

भूलै दे


याद कोरा वे बाजा सन

जैकि धुन मा सब झुम्दा छाँ

जैकु सुरिलू स्वर दिल मा

घुम्दा छाँ

जैकि हर ब्यो मा खल्दे छैन कमी

जैकि धुन लौंदी छैन बीती यांदें

जैकि वजह से औंदी छैन आँखों मा नमी


मसक बाजा सने भूल गैन हम

जू जू छौ हमारु

वे सने ख्वेदी हमन

गढ़वालकु नाम जू छौ

देवभूमि

वे मा दानव बसै देन हमन

सारी सुन्दरता सनेई

मिटै दे हमन

चमक्दु गढ़वाल

वे मसक बाजा कि ताल

भैरो सब लग्दुच कमाल

पर घौरा मनखी

पे उठ्दु च सवाल


भैजी

अवा बदलदन छान

सब्बी की सोच

अवा भैजी

बजोंदन नयी सोचा कु

ढोल

अवा भैजी खोल्दन

नया दरवाज़ा

अवा भैजी

बजौंदन फिर से

उ मसक बाजा

गढ़वालकु

मसक बाजा

मसक बाजा

शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

कन ब्वारी चएंदी च ? Copyright © अनुपम ध्यानी


माँ कबर बीटिं लगीं च

बेटा ब्यो कब करणु कु विचार च

स्याणु हवे गें तो

बता मैं सने

कन ब्वारी चएंदी

मिन लौंण


मिन बवाली ब्यो कु बारा मा

त मिन अभी सोची नि च

तुम सने ब्वारी चएंदी च

तुम ही बातें देया

कै चुल्ला माँ तुमण

झोक्ण मैं सने

खुद तैं के देया


पिताजी का चेहरा मा चिंता देखि

माँ कु मन पढ़ी कि देखि

भुल्ली कु उत्साह भी खूब देखि

देखि की तैं मिन अपनी गिच्ची खोली


ब्वारी कु दिल

बद्रिवाशालाकी जन

बडू होनु चएंदु

बाल भागीरथी कि लहरा जन

शीतल होण चएंदी छन

बुरांस कि जन सुन्दर

वुइं कि त्वचा होणी चएंदी च

सुबेर तन खिलणी चएंदी च

जन बरसाता का ठीक पहला

काफल पक्दु

जन गर्मी की धूप मा

केदारनाथ कु मंदिर

चमक्दु

माँ तू मेरु दिल जणदी छें

बस तन हुइएनि चएंदी

जन पल्ली पार

बाह बाज़ार कु हल्ला होंदु

ते सने मिल्ली नि तन ब्वारी

किले कि मैं सने

पूरु गढ़वाल

चएंदु च


अब बात तन च

कि माँ ब्वारी

ढुंढणु कि बात

छेड्दी नी च

किले कि सब लड़कियां

अब कु ज़माना कि

तन होंदी नि छन

दिब्र्ग गौं लगदु च

मेरु गढ़वाल बदबू

मरदु च

अब त बस एक ही इच्छा च

घर बसौलू तब्बी

जब सब गढ़वाली

गढ़वाल सने उन्च्छु उठौला

और भैरे चकाचौन्द से पहला

गढ़वाल सने

सम्मान दिलौला

सम्मान दिलौला

सम्मान दिलौला

तिन नि औण ..बेटा !!! Copyright © अनुपम ध्यानी


खीसा मा कुछ नी छौ

नि छौ कुछ झोला मा

बस छौ उम्मीद कु दामन

सपणा आँखों मा


पढै लिखी ख़त्म कोरी की तैं

मिन यख औंण की सोची

विदेशामा कुछ बणि की टी दिखै दयूं

मिन तक्खी तक ही सोची


माँ, बाप, भुल्ली कु प्यार

सने दिल मा दबै कि तैं

मिन जन तन हिम्मत जुटे

पर सोब का सोब , सोचण लग गेन

स्यु जू गै अब, येन अब नि औण


तीन साल हुए गेन

मिन घौर कि शक्ल नि देखि

भट्ट नि बुकैन

झंगोरू , कोदू ,पाल्यो नि चखी

रयोंदुं छौन मैं कई बार

पर बोल नि सक्दौं

घोरा लोखुं कु दर्द बिन्ग्दौं मैं

पर खुद का राज़ खोल नि सक्दौं


अब ता च्च्ची न जू बोली छौ

वू सच लगदु च

तिन बल वख बस नोट कमोंण

इक बार जो तू चलगी

बेटा तिन घौर नि औंण


तुम सण कण बतेइ सकदु

कि मेरु मन लगदु नि च यख

घोर, प्रेम और मन

वख च वख

जख जख्या कु छौंक लगदु

जख द्वी रुट्ठी मा

घौर चल्दु

जख पिताजी डांट लागोंदन

जख माँ नींद बीटी जगौन्दी च

जख भुल्ली लड़दी च

अब तो लगदु कि

च्च्ची न झूठ नि बोली छौ

तिन बस वख बर्गेर, पिज्ज़ा ही खै सकण

बेटा तू जानी तो छें

तिन घौर नि ए सकण


छि कख फस्यों मैं

कब जलु घौर

जख होली ख़ुशी

जख हुली उमंग कि बौर

च्च्ची तेरी बात सने

एक दिन मिन हरै कि रखण

तिन देखण एक दिन

मिन वापिस औंण

जल्दी औंण