( जन्मपत्री मिलाने पर एक व्यंग, कविता के माध्यम से )
जजमानन पण्डाजी से बोली ..
पंडाजी , जर ई जल्म्पत्री मिल्या क्य ?
पंडाजील पत्री देखी , बोली ..
नौनी की कुंडलिम दूसरा स्थानम कांग्रेस
चौथम बी जे पी …….
अर सप्तमम काम्निस्ट बैट्या छंन !
एक हैका थै देख देखी
अपणी अपणी चाल चलना छन !
जजमान इका भाग्य थै दिखणा छन
आरजेडी अर समाज्बादी ,
ब्यो का बाद उन त , सब ठीक ठाक छ
पर डैर याकि चा ….
नाती नतणों हवाला नक्सलवादी !
मि उत्तराखँडी छौ - यू शब्द ही अपणा आप ये ब्लाग क बारा मा बताणा कुण काफी छन। अपणी बोलि/भाषा(गढवाली/कुमाऊँनी) मा आप कुछ लिखण चाणा छवा त चलो दग्ड्या बणीक ये सफर मा साथ निभौला। अपणी संस्कृति क दगड जुडना क वास्ता हम तै अपण भाषा/बोलि से प्यार करनु चैंद। ह्वे जाओ तैयार अब हमर दगड .....अगर आप चाहणा छन त जरुर मितै बतैन अर मि आप तै शामिल करि दयूल ये ब्लाग का लेखक का रुप मा। आप क राय /प्रतिक्रिया/टिप्पणी की भी दरकार च ताकि हम अपणी भासा/बोलि क दगड प्रेम औरो ते भी सिखोला!! - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल
शनिवार, 7 अगस्त 2010
सुधि सुधि ,मी , स्वीणा नि दिखावा !
बोडी,
अफ़ी अफुम छै बुनी ..
यखका सुचणा छना ..
कि, उन्दु जौला ......
अर तखुन्दा (प्रवासी ) सुचणा छन
कि उबू जौला .....!
मिन बोली , बोडी...,
तू क्या छै सुचणी ?
बोडिल ब्वाळ ...
ना यख वालों न रुकुनु ?
अर , ना ताल वालो ल आणु
गिचा बाबू .. क्या .... ???????
जू बुल्दन बुल्द जा
जू सुचणा छन , सुचुद जा ..
आणा छा, त आवा
जाणा छा , त जावा
पर सुधी सुधी , मी थै
स्वीणा त, नि दिखावा !
पराशर गौर
१८ मई २०१० रात १०२१ पर
कैनाडा
अफ़ी अफुम छै बुनी ..
यखका सुचणा छना ..
कि, उन्दु जौला ......
अर तखुन्दा (प्रवासी ) सुचणा छन
कि उबू जौला .....!
मिन बोली , बोडी...,
तू क्या छै सुचणी ?
बोडिल ब्वाळ ...
ना यख वालों न रुकुनु ?
अर , ना ताल वालो ल आणु
गिचा बाबू .. क्या .... ???????
जू बुल्दन बुल्द जा
जू सुचणा छन , सुचुद जा ..
आणा छा, त आवा
जाणा छा , त जावा
पर सुधी सुधी , मी थै
स्वीणा त, नि दिखावा !
पराशर गौर
१८ मई २०१० रात १०२१ पर
कैनाडा
मंथन
होने दो हिने दो
आज विचरो का मंथन
विचारो से उत्पन होगी क्रांति
जग करेगा उसका अभिनन्दन !
सुना है की राजधानी
उंचा सुनती है
सता में बैठे लोग
अंधे,गूंगे, बहरे होते है
अब अंधे, गुंगो को ..
रहा दिखानी होगी
उनसे उनके ही राग में
उनसे बात करनी होगी
करना होगा दूर हमको
उनका वो गुंगा/अंधापन ... होने दो होने दो ..
भूखा - भूखा न सोयेगा अब
अधिकारों की बात करेगा
खोलेगा राज वो अब
पतित भ्रष्ट , भ्रष्टा चारो का
हटो ह्टो, दूर हटो,
ग्रहण करेगी जनता आज राज सिंघ्खासन ..... होने दो होने दो
हासिये पर हो तुम
जनता का रथ मत रोको
बदने दो उसको उसके लक्ष्य तक
मत उसको टोको
रोक न पावोगे प्रभाऊ उसका
गर बिगड़ गई वो
सांस लेना होगा तुमको दूभर
गर बिफर गई वो ...
भुलोमत , मतभूलो
की है जनता जनार्धन .... होने दो ...
आम पथों से राज पथ तक
बस एक ही होगा नारा
हक़ दो, हक़ दो ...हटो
है राज हमारा .......
एक ही स्वर में नभ गूंजेगा तब
स्वीकार नही है , भ्रष्टो का शाशन .. होने दो ...
पराशर गौर
६ मार्च २०१० सुबह ७.२७ पर
आज विचरो का मंथन
विचारो से उत्पन होगी क्रांति
जग करेगा उसका अभिनन्दन !
सुना है की राजधानी
उंचा सुनती है
सता में बैठे लोग
अंधे,गूंगे, बहरे होते है
अब अंधे, गुंगो को ..
रहा दिखानी होगी
उनसे उनके ही राग में
उनसे बात करनी होगी
करना होगा दूर हमको
उनका वो गुंगा/अंधापन ... होने दो होने दो ..
भूखा - भूखा न सोयेगा अब
अधिकारों की बात करेगा
खोलेगा राज वो अब
पतित भ्रष्ट , भ्रष्टा चारो का
हटो ह्टो, दूर हटो,
ग्रहण करेगी जनता आज राज सिंघ्खासन ..... होने दो होने दो
हासिये पर हो तुम
जनता का रथ मत रोको
बदने दो उसको उसके लक्ष्य तक
मत उसको टोको
रोक न पावोगे प्रभाऊ उसका
गर बिगड़ गई वो
सांस लेना होगा तुमको दूभर
गर बिफर गई वो ...
भुलोमत , मतभूलो
की है जनता जनार्धन .... होने दो ...
आम पथों से राज पथ तक
बस एक ही होगा नारा
हक़ दो, हक़ दो ...हटो
है राज हमारा .......
एक ही स्वर में नभ गूंजेगा तब
स्वीकार नही है , भ्रष्टो का शाशन .. होने दो ...
पराशर गौर
६ मार्च २०१० सुबह ७.२७ पर
अवार्ड क्या हू न्द?
अवार्ड क्या हू न्द ?
वा बोली .
हेजी , यु अवार्ड क्या हू न्द ?
मिन बोली....,
लुखु समणी अपणु तमशु दिखै दिखै
जू ईजात , अर, बेजती हू न्द
वो अवार्ड हुन्द औरी कपाल हू न्द !
parashagaur
वा बोली .
हेजी , यु अवार्ड क्या हू न्द ?
मिन बोली....,
लुखु समणी अपणु तमशु दिखै दिखै
जू ईजात , अर, बेजती हू न्द
वो अवार्ड हुन्द औरी कपाल हू न्द !
parashagaur
बुधवार, 4 अगस्त 2010
अछु ह्वै
मिन बोली पंडत जी ..
जरा ई जन्म पत्री दिखया
कनी दशा लगी होली जू इन ह्वै गे
अछु भलु पड्यु लिखू नोनू छो
मती मरेगी एकी जू , पुलिसम भर्ती ह्वै गे !
पंडित्ल बोली ...
हून त येल नेता छो , पर चला
अछु ह्वै जू पुलिसम चलिगे
अरे जजमान नेता से पुलिस भलो
वो त पाच साल tak रालू , पर युत
ता जिन्दगी भर घूस खालो !
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मिन बोली पंडत जी ..
जरा ई जन्म पत्री दिखया
कनी दशा लगी होली जू इन ह्वै गे
अछु भलु पड्यु लिखू नोनू छो
मती मरेगी एकी जू , पुलिसम भर्ती ह्वै गे !
पंडित्ल बोली ...
हून त येल नेता छो , पर चला
अछु ह्वै जू पुलिसम चलिगे
अरे जजमान नेता से पुलिस भलो
वो त पाच साल tak रालू , पर युत
ता जिन्दगी भर घूस खालो !
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