गुरुवार, 26 अगस्त 2010

हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

हम छोड चले है महफिल को याद आये कभी तो मत रोना
(गढवाली मे अनुवाद करने का एक प्रयास)

हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै,
याद एली अगर त रवै न कभी
यी जिकुडी ते बुथै लेई तू,
घबरालु अगर त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

एक सुपिन सी देखी छ्याइ हमनू
जब आंख ख्वाली त टूटि ग्याई
यु प्यार अगर सुपिन बनि की
तडपाल तुझे त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

तु म्यार ख्यालो मे
बरबाद नी कैरी अपर जीवन तै
जब क्वी दगड्या बात त्वै तै
समझालू त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

जीवन का सफर मा यखुली
मितै त जिन्दा नी छ्वाडली
मुरण की खबर ये मेरी जिकुडी
मिलली त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल



(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

सोमवार, 9 अगस्त 2010

शनिवार, 7 अगस्त 2010

द्याखोदी !

( जन्मपत्री मिलाने पर एक व्यंग, कविता के माध्यम से )


जजमानन पण्डाजी से बोली ..
पंडाजी , जर ई जल्म्पत्री मिल्या क्य ?
पंडाजील पत्री देखी , बोली ..
नौनी की कुंडलिम दूसरा स्थानम कांग्रेस
चौथम बी जे पी …….
अर सप्तमम काम्निस्ट बैट्या छंन !
एक हैका थै देख देखी
अपणी अपणी चाल चलना छन !
जजमान इका भाग्य थै दिखणा छन
आरजेडी अर समाज्बादी ,
ब्यो का बाद उन त , सब ठीक ठाक छ
पर डैर याकि चा ….
नाती नतणों हवाला नक्सलवादी !

सुधि सुधि ,मी , स्वीणा नि दिखावा !

बोडी,
अफ़ी अफुम छै बुनी ..
यखका सुचणा छना ..
कि, उन्दु जौला ......
अर तखुन्दा (प्रवासी ) सुचणा छन
कि उबू जौला .....!

मिन बोली , बोडी...,
तू क्या छै सुचणी ?

बोडिल ब्वाळ ...
ना यख वालों न रुकुनु ?
अर , ना ताल वालो ल आणु
गिचा बाबू .. क्या .... ???????
जू बुल्दन बुल्द जा
जू सुचणा छन , सुचुद जा ..

आणा छा, त आवा
जाणा छा , त जावा
पर सुधी सुधी , मी थै
स्वीणा त, नि दिखावा !

पराशर गौर
१८ मई २०१० रात १०२१ पर
कैनाडा

मंथन

होने दो हिने दो
आज विचरो का मंथन
विचारो से उत्पन होगी क्रांति
जग करेगा उसका अभिनन्दन !

सुना है की राजधानी
उंचा सुनती है
सता में बैठे लोग
अंधे,गूंगे, बहरे होते है
अब अंधे, गुंगो को ..
रहा दिखानी होगी
उनसे उनके ही राग में
उनसे बात करनी होगी
करना होगा दूर हमको
उनका वो गुंगा/अंधापन ... होने दो होने दो ..

भूखा - भूखा न सोयेगा अब
अधिकारों की बात करेगा
खोलेगा राज वो अब
पतित भ्रष्ट , भ्रष्टा चारो का
हटो ह्टो, दूर हटो,
ग्रहण करेगी जनता आज राज सिंघ्खासन ..... होने दो होने दो

हासिये पर हो तुम
जनता का रथ मत रोको
बदने दो उसको उसके लक्ष्य तक
मत उसको टोको
रोक न पावोगे प्रभाऊ उसका
गर बिगड़ गई वो
सांस लेना होगा तुमको दूभर
गर बिफर गई वो ...
भुलोमत , मतभूलो
की है जनता जनार्धन .... होने दो ...

आम पथों से राज पथ तक
बस एक ही होगा नारा
हक़ दो, हक़ दो ...हटो
है राज हमारा .......
एक ही स्वर में नभ गूंजेगा तब
स्वीकार नही है , भ्रष्टो का शाशन .. होने दो ...

पराशर गौर
६ मार्च २०१० सुबह ७.२७ पर