बुधवार, 1 सितंबर 2010

कुछ इनै भी



कुछ इनै भी……

लीसू सी..
कथुक ध्वालो ये ते फुंडै
मारो कूटो भी
चिपक्यू रेंद यू
हमर दगडी
लीसू सी
  
टिपड़ा 
जन्म ह्वे ब्वै बुबा
टिपडा बनै
बामण भी द्वी पैसा कमै
सुख मा दुख मा
जब कुछ नी सूझी
फिर टिपडा पूजी
ब्यो कुण भी टिपडा मिले
अब ह्वे गीन नोन बाल
हम भी लग्या छंवा
टिपड़ा पूजण मा

मेरे जिकुड़ी
तेर भी अर  मेर भी
जिकुड़ी धक धक करदी
पर अलग अलग बाणी बुलदि
क्वी मयलू
क्वी गुसेलु
क्वी कर दू प्यार
क्वी कर दू वार
हे रे जिकुड़ी

हैंस्या नी केर
नोनि जवान ह्वेगे
लाटी अब
सब्यू की समणी
खित खित नी हैंस्या केर्
निथर लोग ब्वालल कि
ठीक नी
नोनि कु सवर
तु अब
खित खित नी हैंस्या केर  

आंखि
मुखडि मा लगी छन
द्वी ढिबरा सी आंखि
बस अफूकि दिखदू
जू दिखण चान्द
बुल्दू कि
त्यार दुख च म्यार दुख
हैंका कु दुख देखि
फुटि जंदिन यू आंखि
है तेरि आंखि
प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल, अबु धाबी, यू ए ई


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

हम छोड चले है महफिल को याद आये कभी तो मत रोना
(गढवाली मे अनुवाद करने का एक प्रयास)

हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै,
याद एली अगर त रवै न कभी
यी जिकुडी ते बुथै लेई तू,
घबरालु अगर त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

एक सुपिन सी देखी छ्याइ हमनू
जब आंख ख्वाली त टूटि ग्याई
यु प्यार अगर सुपिन बनि की
तडपाल तुझे त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

तु म्यार ख्यालो मे
बरबाद नी कैरी अपर जीवन तै
जब क्वी दगड्या बात त्वै तै
समझालू त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

जीवन का सफर मा यखुली
मितै त जिन्दा नी छ्वाडली
मुरण की खबर ये मेरी जिकुडी
मिलली त रवै न कभी
हम छोडिक चली ग्या यी महफिल तै

- प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल



(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

सोमवार, 9 अगस्त 2010

शनिवार, 7 अगस्त 2010

द्याखोदी !

( जन्मपत्री मिलाने पर एक व्यंग, कविता के माध्यम से )


जजमानन पण्डाजी से बोली ..
पंडाजी , जर ई जल्म्पत्री मिल्या क्य ?
पंडाजील पत्री देखी , बोली ..
नौनी की कुंडलिम दूसरा स्थानम कांग्रेस
चौथम बी जे पी …….
अर सप्तमम काम्निस्ट बैट्या छंन !
एक हैका थै देख देखी
अपणी अपणी चाल चलना छन !
जजमान इका भाग्य थै दिखणा छन
आरजेडी अर समाज्बादी ,
ब्यो का बाद उन त , सब ठीक ठाक छ
पर डैर याकि चा ….
नाती नतणों हवाला नक्सलवादी !

सुधि सुधि ,मी , स्वीणा नि दिखावा !

बोडी,
अफ़ी अफुम छै बुनी ..
यखका सुचणा छना ..
कि, उन्दु जौला ......
अर तखुन्दा (प्रवासी ) सुचणा छन
कि उबू जौला .....!

मिन बोली , बोडी...,
तू क्या छै सुचणी ?

बोडिल ब्वाळ ...
ना यख वालों न रुकुनु ?
अर , ना ताल वालो ल आणु
गिचा बाबू .. क्या .... ???????
जू बुल्दन बुल्द जा
जू सुचणा छन , सुचुद जा ..

आणा छा, त आवा
जाणा छा , त जावा
पर सुधी सुधी , मी थै
स्वीणा त, नि दिखावा !

पराशर गौर
१८ मई २०१० रात १०२१ पर
कैनाडा