रविवार, 20 जून 2010

द्वी छुय़ी

द्वी छुय़ी
कुछ शब्द बहुत कुछ बोल जंदिन 

-खुदेड मन म्यार-
खुदेड मन म्यार
करदू रैंद भितर भैर
आंदि च कभी मितै खैर
नी दिखदू तब शाम सुबेर
- कैते बतो -
बैठ्यू रै ग्यू
सुचणू रै ग्य़ू
सुचदा सुचदा
रुमक पोडी ग्ये
क्वी दिखे नी
कैते बतो क्या सोची?
-क्या छंवी लगाण-
यू भी कर दूय़ं
वू भी कर दूयं
क्या बुतण 
अर क्या चुसण
अब तुमम 
क्या छंवी लगाण  
- रगरयाट -
आज किलै ह्वाल
हुंयु यू तौं फिर
रगराय़ट
बुढे गीन पर
नी छुट यूंक
सदिन्यु क रगरयाट
- छुंयाल -
छुंयाल छौ !!!
इन बुल्दिन लोग 
कभी छ्वी इनै की
कभी छ्वी उनै की
पर बुल्दु छौ जु
लोग बुल्वदिन ..
- बिसर ग्यो -

ध्यै लगेकि ब्वालि वीन 
चिन्नी लयेन आंद दफे
पहुंची जब  बज़ार 
मिल गीन यार द्वी चार
लगिन गप्प अर 
घूंट गीन भितर द्वी चार 
लमडदू लमडदू 
पौंछि मी गौ मा
कैकि चिन्नी
मित बिसर ग्यु अपर घार   

-प्रतिबिम्ब बड्थ्वाल , अबु धाबी


(अपनी बोलि अर अपणी भाषा क दग्डी प्रेम करल्या त अपणी संस्कृति क दगड जुडना मा आसानी होली)

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